Thursday, March 1, 2012

मन

ऐ मन! तू क्यों झूमता जा रहा,
इस भीड़ भरे संसार में,
इस मेघ की फुहार में,
तू क्यों अकेला भीगता गा रहा,
ऐ मन!तू क्यों झूमता जा रहा।
राह पे पत्थ्रर बिछे,हर कदम पे काँटे सजे,
इस विकट राह को तू मात देता जा रहा,
ऐ मन!तू क्यों झूमता जा रहा।
सब यहाँ हैं मतलबी,तू थका नही अभी?
इस खुद्ग़र्ज भीड़ मे तू प्यार ढूँढ़ता जा रहा,
ऐ मन!तू क्यों झूमता जा रहा।
हर तरफ भ्रष्टाचार है,
बढ रहा अत्याचार है,
किसी रावण का जैसे हो रहा
स्वप्न साकार है,
उस रावण के विनाश का तू शपथ लेता जा रहा,
ऐ मन!तू क्यों झूमता जा रहा।

इन्तज़ार.........

कितनी सदियाँ बीत गयीं,कितने पल हैं जाने को|
आस लगाये बैठा हूँ,कह गये थे तुम जो आने को|
हालत मेरी कैसी है,अब क्या है तुम्हे बताने को?
अम्बर पे उड़ते बादल से पूछो, तरसे जो बरसाने को|
कुछ और नही बस प्यार मेरा,बचा है तुम्हे जताने को|
उस राह अभी भी बैठा हूँ,जिसे चुना था तुमने जाने को|
आओगे कभी लौट के तुम,ये उम्मीद मुझे जगाने दो|
कितनी सदियाँ बीत गयीं,कितनी सदियाँ हैं बिताने को.....