ऐ मन! तू क्यों झूमता जा रहा,
इस भीड़ भरे संसार में,
इस मेघ की फुहार में,
तू क्यों अकेला भीगता गा रहा,
ऐ मन!तू क्यों झूमता जा रहा।
राह पे पत्थ्रर बिछे,हर कदम पे काँटे सजे,
इस विकट राह को तू मात देता जा रहा,
ऐ मन!तू क्यों झूमता जा रहा।
सब यहाँ हैं मतलबी,तू थका नही अभी?
इस खुद्ग़र्ज भीड़ मे तू प्यार ढूँढ़ता जा रहा,
ऐ मन!तू क्यों झूमता जा रहा।
हर तरफ भ्रष्टाचार है,
बढ रहा अत्याचार है,
किसी रावण का जैसे हो रहा स्वप्न साकार है,
उस रावण के विनाश का तू शपथ लेता जा रहा,
ऐ मन!तू क्यों झूमता जा रहा।
इस भीड़ भरे संसार में,
इस मेघ की फुहार में,
तू क्यों अकेला भीगता गा रहा,
ऐ मन!तू क्यों झूमता जा रहा।
राह पे पत्थ्रर बिछे,हर कदम पे काँटे सजे,
इस विकट राह को तू मात देता जा रहा,
ऐ मन!तू क्यों झूमता जा रहा।
सब यहाँ हैं मतलबी,तू थका नही अभी?
इस खुद्ग़र्ज भीड़ मे तू प्यार ढूँढ़ता जा रहा,
ऐ मन!तू क्यों झूमता जा रहा।
हर तरफ भ्रष्टाचार है,
बढ रहा अत्याचार है,
किसी रावण का जैसे हो रहा स्वप्न साकार है,
उस रावण के विनाश का तू शपथ लेता जा रहा,
ऐ मन!तू क्यों झूमता जा रहा।