Thursday, February 18, 2016

कोई तरकीब साध दे तू,
कोई  मशवरा हाथ दे तू,
कब तक घुमू बिन मंजिल के मौला,
इन पैरों मे कोई जरीब बांध दे तू|

कोई मंजिल दे मुझे और उससे,
जुड़े रास्तों से एक मुलाकात दे तू,
मैं मंजिलें और रास्ते ही सोचता रहूँ मौला,
मंजूर नही, फिर ऐसी बदनसीब रात दे तू|

एक लक्ष्य पा लिया,अब साथ दे तू,
वतन के लिये कुछ करने का जज़्बात दे तू,
अब मुझे वतन पे मरने की चाहत भी हो गयी मौला,
ये मन सरहद के करीब बांध दे तू|

सर जमीं पे गैर के झुका दे,ऐसे हम नही,
हमें अब मौत का भी कोई ग़म नही,
पर सरहद से एक नौजवाँ न कम हो जाये मौला,
इसलिये, इन हाथों मे एक ताबीज़ बांध दे तू|

Wednesday, February 10, 2016

रात ख्वाब में आते हैं जो पल चाहत के,
उन्हे ख्वाब से छूट कर निकल जाने दे|
बड़े देर से कैद है जो उस पल की हसरत,
उसे वक्त से छूट कर इस पल आने दे|
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बड़े वक्त तक जला ये सूरज भी तेरी खातिर,
 
और बची लपटें भी आखिर यूँ ही जल गयीं |
बड़े वक्त तक रोका हसीं शाम भी तेरी खातिर,
पर बिन तेरे आज भी ये तन्हा ही ढल गयी |
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दर्द तो वही था, ज़ख्म कुछ नया था  कुछ पूराना था|
जो सच था हमे मंजूर न था, और बाकि सब तेरा बहाना था|
कोशिश तो थी कि सारे राज बोल दूं तुम्हे तब,
पर जो हँसता देख लिया तुमको ,तो सब दिल मे ही  छुपाना था| 
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तेरे जुर्म में मै भी शामिल हो जाऊँ,
फिर देखुं की क्या सजा हासिल होगी?
मुश्किल थी तेरी बेवफई अब तक,
 तो क्या तेरी वफा भी मुश्किल होगी?
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उन हवाओं को मैं पहचानता हूँ जो तुम्हे छूकर आती हैं|
गर शिकायत हो तो कैद कर लेना बंद कमरे मे खुद को,
क्योंकि तेरे हर पल का हाल वो मुझे ही आकर सुनाती हैं|
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मेरी खामोश चाहत की आखिरी हद भी, बस तेरी इक आवाज़ तक है|
फिर भी मैं बेकरार  कई ज़माने से हूँ, और तू बेखबर आज़ तक है|

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आज सफर में बैठे सोच रहा हूँ,
काश ज़िंदगी भी इतनी ही तेज चलती|
कुछ ज़रुरी पड़ावों पे रुकती,
 कुछ ऐसे ही पार कर जाती|
बेशक कुछ पड़ाव खुशी के आते कुछ गम के
पर हमे वक्त कहाँ मिलता इतना सोचने का|
फिर ज़िंदगी कितनी आसान हो जाती....
फिर सोचता हूँ यार ज़िंदगी ऐसी ही होती,
तो किसी पिक्चर की कहानी हो जाती|
कुछ दिन पर्दे पे चलती,
फिर हम भूल जाते फिर पूरानी हो जाती|
कुछ पाने  की शिकायत आज है हमे कुछ खोने की भी शिकायत आज है|
तुझे  न बताने की शिकायत आज है हमे तेरे छिपाने की भी शिकायत आज है|
तेरे इश्क में रहना, मिलना, बिछड़ना वो लम्हा क्या कुछ और था?
या यूँ ही गुज़रना था जिसे एक दिन कभी वही गुज़रता हुआ दौर था|
मेरी हंसती  ज़िन्दगी को बर्बाद करने तेरे आने की शिकायत आज है,
और बस यूँ ही बर्बाद करके तेरे चले जाने की भी शिकायत आज है|
तेरे सारे वादों के तेरी खुद की बातों से ही कितने बैर निकले,
जो सपने तेरी ही आँखों से चुने थे वे  तेरे ही कितने गैर निकले|
कुछ हसीं यादों को और तेरे सारे ग़मों को तेरे संग ही भूलाने की शिकायत आज है|
पर हमे बिन तेरे और बिन तेरी यादों के यूँ मुस्कुराने की भी शिकायत आज है|

Wednesday, February 20, 2013

पूरा दिन तपता रहा मैं सूरज की तरह,
तुझे एहसास हुआ जब मैं शाम हुआ|
जब मैं डूबने को आया,जब मैं गुमनाम हुआ|
कभी आसमां में उड़ता था,कुछ खास था मैं,
फिर ज़मीं के करीब आया, मैं आम हुआ|
तुझे पाने की ही तपिश थी जो उतना जलता था मैं,

कुछ देर से समझा जो इतना मैं बदनाम हुआ|

Thursday, March 1, 2012

मन

ऐ मन! तू क्यों झूमता जा रहा,
इस भीड़ भरे संसार में,
इस मेघ की फुहार में,
तू क्यों अकेला भीगता गा रहा,
ऐ मन!तू क्यों झूमता जा रहा।
राह पे पत्थ्रर बिछे,हर कदम पे काँटे सजे,
इस विकट राह को तू मात देता जा रहा,
ऐ मन!तू क्यों झूमता जा रहा।
सब यहाँ हैं मतलबी,तू थका नही अभी?
इस खुद्ग़र्ज भीड़ मे तू प्यार ढूँढ़ता जा रहा,
ऐ मन!तू क्यों झूमता जा रहा।
हर तरफ भ्रष्टाचार है,
बढ रहा अत्याचार है,
किसी रावण का जैसे हो रहा
स्वप्न साकार है,
उस रावण के विनाश का तू शपथ लेता जा रहा,
ऐ मन!तू क्यों झूमता जा रहा।

इन्तज़ार.........

कितनी सदियाँ बीत गयीं,कितने पल हैं जाने को|
आस लगाये बैठा हूँ,कह गये थे तुम जो आने को|
हालत मेरी कैसी है,अब क्या है तुम्हे बताने को?
अम्बर पे उड़ते बादल से पूछो, तरसे जो बरसाने को|
कुछ और नही बस प्यार मेरा,बचा है तुम्हे जताने को|
उस राह अभी भी बैठा हूँ,जिसे चुना था तुमने जाने को|
आओगे कभी लौट के तुम,ये उम्मीद मुझे जगाने दो|
कितनी सदियाँ बीत गयीं,कितनी सदियाँ हैं बिताने को.....